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रविवार, 9 फ़रवरी 2014

कौन करता है बूट पॉलिश राज कपूर जी ?



  • संजीव खुदशाह

फिल्म का नाम बूट पॉलिश
अवधि--153 मिनट
निर्देशकप्रकाश अरोरा
बैनरराज कपूर

यह फिल्म 1954 के आस पास बनी थी। इस ब्लैक एड व्हाइट फिल्म में राज कपूर ने एक ऐसा मुद्दा उठाया जिसे अन्य बैनर उठाने में हिचकिचाते थे। पहले पहल जो भी फ़िल्मे बनी उनमें धार्मिक फ़िल्मो की भरमार थी या किसी पुरानी लोक कहानियों से प्रेरित थी। कारण साफ था ऐसी फ़िल्मो से कमाई होने की गारंटी थी। राज कपूर ने लीग से हटकर फिल्म बनाने की परिपाटी प्रारंभ की आवारा,श्री 420, अनाडी, बूटपालिश ऐसी ही फ़िल्मो की श्रृंखला है।
इस फिल्म में भोला(रतन कुमार) और बेलू(बेबी नाज) दो भाई बहन हैं जिनकी माँ का देहांत हो गया है और पिता को कारावास। उनको उनकी दुष्ट चाची कमला के साथ रहने जाना पड़ता है। कमला उनसे भीख मँगवाती है और उन्हें बुरा-भला कहती है। यह फिल्म रेल्वे स्टेशन के ईर्द-गिर्द घूमती है। स्टेशन के पास ही झोपडीनुमा घर वे रहते है, जहां से ये दोनो भाई बहन भाग कर में रेल गाड़ी में भीख मांगने चले जाते। एक अवैध शराब बनाने वाला अधेड व्यक्ति है, जिसको बच्चे जॉन चाचा (डेविड) के नाम से जानते हैं। जॉन चाचा उनको भीख माँगना छोड़कर एक स्वाभिमान की ज़िंदगी जीने की सलाह देता है।
बच्चे उसकी बात मानकर कुछ पैसे बचा कर बूट पॉलिश का सामान खरीदते हैं। जब कमला को इस बात का पता चलता है तो वह उनका सामान छीन कर उन्हें मारती है और घर से निकाल देती है।
वर्षा होने के कारण अब कोई भी व्यक्ति उनसे बूट पॉलिश भी नहीं कराता है और दोनों को भरपेट भोजन भी नसीब नहीं होता है। असहाय बच्चे तब भुखमरी के कगार पर पहुँच जाते हैं जब जॉन चाचा को अवैध शराब बनाने के जुर्म में हिरासत में ले लिया जाता है। एक दिन रेलवे स्टेशन पर अनाथ बच्चों को अनाथालय ले जाने की पकड़ धकड़ चल रही थी। बेलू ट्रेन में चढ़कर बच निकलती है और भोला से बिछड़ जाती है। ट्रेन में बेलू को एक अमीर दंपत्ति गोद ले लेते है। बेलू भोला से बिछड़कर दुःखी हो जाती है।
बूट पॉलिश का काम शुरु करने के बाद भोला ने बेलू को भीख माँगने से मना किया था और यहाँ तक कि बेलू ने कहा न मानने पर उसपर हाथ भी उठाया था, लेकिन अब हालात इतने नाज़ुक हो जाते हैं कि भोला को ख़ुद भीख माँगने की नौबत आ जाती है और एक दिन जब वह रेलवे स्टेशन पर भीख माँग रहा होता है तो उसकी मुलाक़ात बेलू से हो जाती है। फिर दोनों बच्चों को वह अमीर दंपत्ति गोद ले लेते है। फ़िल्म के अंत में दिखाया गया है कि अब दोनों बच्चे स्कूल जा रहे हैं।
प्रकाश अरोड़ा द्वारा निर्देशित इस श्वेत श्याम फिल्म बूट पॉलिश में बेबी नाज़ , रतन कुमार, चाँद बुर्के और चरित्र अभिनेता डेविड अब्राहम ने अभिनय किया है।  इस फिल्म को सर्वोत्तम फिल्म के लिए फिल्म फ़ेयर पुरस्कार मिला था केन्स फिल्म समारोह में बाल कलाकार के रूप में बेबी नाज़ के उत्कृष्ट अभिनय का विशेष उल्लेख किया गया । डेविड को सर्वोत्तम सहायक अभिनय के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था।
राज कपूर की अन्य फिल्मो की तरह इस फिल्‍म मे भी निर्माता-निर्देशक की मेहनत साफ झलकती है। निर्देशन और अभिनय पक्ष दमदार है, सूट किया गया लोकेशन जीवंत प्रतीत होता है। सुरीले गीतो से सजी यह फिल्म व्यवसायीक एवं मनोरंजन के दृष्टिकोण से बेहतरीन है। लेकिन फिल्म भारतीय जन मानस की सच्चाई बयां करने में विफल रहती है। यह फिल्‍म शुरू से आखरी तक जाति एवं जातिगत मुद्दों पर बात करने पर परहेज करती है। जबकि भारत का हर व्यक्ति जानता है की  बूट पॉलिश कौन सी जाति के लोग करते है। यहां का कुलीन वर्ग मरते मर जायेगा लेकिन बूट पालिश नही करेगा। राज कपूर शायद इस तथ्य को जानते हुए भी अनजान बनने की कोशिश करते है। जैसा की फिल्म का नाम बूट पॉलिश से झलकता है कि इसमें बूट पालिश करने वाले वर्ग के सुख दुख का लेखा जोखा मिलेगा। किन्तु इस फिल्म में ठीक इसके उल्टा होता है।
अंत में यह दोनो बूट पालिश करने वाले बच्चों को एक रईस निःसंतान दंपत्ति गोद ले लेते है। यहां भी जाति का मुद्दा ग़ायब रहता है। जबकि 1954 में फिल्म निर्माण के वक्त जाति प्रथा, छुआ-छूत चरम पर थी। बेहतर होता इस फिचर फिल्म में उन लाखों लोगो के दुख दर्द को सिल्वर स्क्रीन में उतारा जाता, जिन्होंने पीढी दर पीढी इस कार्य को किया और भोगा है।


शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

इलीट क्लास (कुलीन वर्ग) का-सत्याग्रह अभिजात्य वर्ग का सत्याग्रह

  • संजीव खुदशाह
बहुत हद तक यह फिल्म अन्ना के आंदोलन से प्रभावित दिखती है। जिस प्रकार अन्ना का इलीट क्लास आंदोलन जनलोकपाल से सारे भ्रष्टाचार के सफाया का दावा करता था। उसी प्रकार यह फिल्म भी पेन्डीगं आवेदन के निराकरण से भ्रष्टाचार का सफ़ाया करने का अनोखा सत्याग्रह करता है। दरअसल यह फिल्म भी अन्ना के अभिजात्यवादी आंदोलन के तर्ज पर भ्रष्टाचार के मूल कारण धार्मिक और जातिगत भ्रष्टाचार को जङ से उखाङने से परहेज करता है। 
प्रकाश झा की फिल्म सत्याग्रह सरकारी भ्रष्टाचार पर केन्द्रित है। यह एक ऐसे बुजुर्ग पिता द्वारका आनंद उर्फ़ दादू की कहानी है, जो अपने ईन्जीनियर बेटे अखिलेश के साथ अम्बिकापुर मे रहता है। अखिलेश कि मौत एक सडक हादसे में हो जाती है। गृह मंत्री बलराम सिंह (मनोज बाजपेई) 25 लाख मुआवजे का ऐलान करते है। इस राशि को प्राप्त करने के लिए अखिलेश की विधवा कलेक्टर आफिस के चक्कर लगाती है। लेकिन रिश्वत नही देने के कारण उसे मुआवजा नही दिया जाता है। परेशान होकर अखिलेश के पिता द्वाराका आनंद कलेक्टर को थप्पङ मार देता है। और उसे जेल में बंद कर दिया जाता है।
 गाँधीवादी द्वारकानाथ आनंद (अमिताभ बच्चन) अंबिकापुर के एक सरकारी स्कूल का रिटायर्ड प्रिसिंपल है, जो अपने दकियानूसी आदर्शों पर चलने के लिए जाने जाता है। अर्जुन राजवंश ( अर्जुन रामपाल) जो द्वाराका आनंद का बिगडैल शिष्य है उसके बचाव के लिए आता है। जब यह खबर विदेश मे रह रहे, अखिलेश के रईस व्यापारी दोस्त, मानव राधवेन्द्र ( अजय देवगन) को लगती है तो वह अंबिकापुर आ जाता है। यह वही दोस्त है जिसे द्वाराका आनंद हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश करता रहता था।
 मानव अपने खर्च पर पोस्टर छपवाकर चौक चौराहे पर लगवाता है। फेसबुक सहित सभी इंटरनेट माध्यम से फ़र्ज़ी फोटो और लाइक संख्या दिखा कर कैम्पेन करता है। इस कैम्पेन में दादु को भ्रष्टाचार विरोधी आईकन की तरह पेश किया जाता है। यहां यह बखूबी दिखाया गया है कि किस प्रकार टी.आर.पी. के लिए लार टपकाती इलेक्ट्रानिक मीडिया फेसबुक की फ़र्ज़ी भीड़(लाईक) और फोटो के झांसे में आकर सचमुच एक बङा कैम्पेन खङा करती है।
इसी केम्पेन के इर्द गिर्द यह फिल्म घूमती है। बहुत हद तक यह फिल्म अन्ना के आंदोलन से प्रभावित दिखती है। जिस प्रकार अन्ना का इलीट क्लास आंदोलन जनलोकपाल से सारे भ्रष्टाचार के सफाया का दावा करता था। उसी प्रकार यह फिल्म भी पेन्डीगं आवेदन के निराकरण से भ्रष्टाचार का सफ़ाया करने का अनोखा सत्याग्रह करता है। दरअसल यह फिल्म भी अन्ना के अभिजात्यवादी आंदोलन के तर्ज पर भ्रष्टाचार के मूल कारण धार्मिक और जातिगत भ्रष्टाचार को जङ से उखाङने से परहेज करता है।
सत्याग्रह का नायक दादू अपनी निजी लड़ाई को सार्वजनिक लड़ाई मे तब्दील कर देता है और खुद नायक बन बैठता है। वास्तविक जीवन में ऐसी घटना कम ही घटती है। यह बात ग़ौर तलब है की अन्ना की तरह दादू भी सरकारी भ्रष्टाचार को ही भ्रष्टाचार मानते है। निजी, धार्मिक और जातिगत शोषण को अपनी महान संस्कृति का अंग मानते है। शायद इसलिए की इन जगहों पर भ्रष्टाचार करने का अधिकार सिर्फ इन्‍ही इलीट क्लास के पास होता है।
 चूकि प्रकाश झा एक मंजे हुए फ़िल्मकार है और वे इससे पहले राजनीति, आरक्षण जैसी फ़िल्मे बना चुके है। उनसे अपेक्षा थी कि वे भ्रष्टाचार की जङ तक जाते और उसके मूल कारणों को इस फिल्म के माध्यम से अवगत कराते। लेकिन उन्होने ऐसा नही किया।
 तकनीकी दृष्टिकोण से यह एक अच्छी फिल्म बन पड़ी है। अर्जुन रामपाल, अमिताभ बच्चन ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। लेकिन मनोज बाजपेयी कुटील नेता के रोल में अपनी पिछली फ़िल्मो की तरह उबाऊ अभिनय करते है। अजय देवगन मानव की भूमिका में जान डालने में ना कामयाब रहे है। उनका हर स्थान पर एक ही तरह से डायलॉग डिलीवरी कही-कही ऊब पैदा करता है। करीना कपूर को टीवी रिपोर्टर के रूप में करने के लिए ज्यादा कुछ नही था। बीच-बीच में वह आंदोलन का हिस्सा बनकर कन्फयूजन पैदा करती है। वही बे वजह मानव से रोमांस करते देखना फिल्म की गंभीरता को खत्म करता है।
 कहानी, पटकथा कमजोर है वही स्क्रीन प्ले, डायरेक्शन, संगीत उम्दा है। ऐसे लोग जो थोड़ा भी समाज और राजनीति से सरोकार रखते है उन्हे ये फिल्म अवश्य देखनी चाहिए।


 फिल्म का नाम सत्याग्रह
 अवधि--192 मिनट
 निर्देशकप्रकाश झा
 बैनर—U.T.V. Motion Pictures
Publish in Forward Press December 2013